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भारतीय परंपरा जीवन की गति के अनुरूप है

 
भारतीय परंपरा जीवन की गति के अनुरूप है…..विविधता का सम्मान, प्रकृति के प्रति गहरी कृतज्ञता व जुड़ाव की प्रक्रिया है…..।  दुनिया में एकाएक कुछ नही होता। भारत की संस्कृति और सभ्यता में भी गहरे कारणों के साथ मौजूद है, समय और जिज्ञासा होने पर हम समझ सकते हैं या प्रक्रियाओं में सहज शामिल हो सकते हैं ।
 जैसे – भारतीय नववर्ष को ही लीजिये… गुड़ी पड़वा, उगादी, बैसाखी, बिहू और भी कई नामों के साथ सभी राज्यों में यह उत्सव मनाया जाता है और इसके बहुत सुंदर मायने हैं। 
बसंत के इस खुशनुमा मौसम में आने वाला त्योहार अद्भुद प्रक्रियाओं का एक बेजोड़ संयोजन है।
\’गुड़ी पड़वा\’ शब्द में गुड़ी कहते हैं –  ध्वज को, यानि पताका को… और खासकर इस पर्व में गुड़ी का अर्थ है विजय पताका। पौराणिक ग्रंथों में कई कहानियां मिलती हैं उनमें से एक बचपन में सुनी भी थी -इस दिन मान्यता है कि \”भगवान श्रीराम\” ने दक्षिण में लोगों को \”बाली\” के अत्याचारों व कुशासन से मुक्ति दिलाई थी। इसी खुशी में हर घर में \”गुड़ी यानि कि विजय पताका\” फहराई गई। यह परंपरा तभी से कई स्थानों पर आज तक जारी है।
गुड़ी पड़वा किसानों का महत्वपूर्ण त्योहार है। त्योहार मौसम की शुरुआत और समापन से संबंधित होते हैं , वैसे ही गुड़ी पड़वा रबी मौसम के अंत का  संकेत भी हैं। दिन रात मेहनत से तैयार की गई फसल कटाई का उत्सव है।
 


कैसे मानते है इस पावन पर्व को- 

 
इस दिन लोग घरों में गुड़ी फहराते हैं। आम के पत्तों की बंदनवार से घरों को सजाते हैं। यह बंदनवार घर में सुख-समृद्धि व खुशियां लेकर आती है ।
हर परिवार घर के स्री की जो भी सुंदर साड़ी, बिंदी, मंगलसूत्र, चूड़ी सजाकर रस्सी से बांध घर के द्वार पर ध्वजा के रूप में फहराते है । 
 

पुरुष बांधे और स्री थामे : 

 
आप देखेंगे के गुड़ी को घर के, भाई, पिता, पति या पुत्र बांधते हैं। जब यह बांधी जाती है तो घर की स्री – पत्नी, मां या बेटी, बहु इसे पकड़ती है –  (अपने हाथों से सहारा दे बांधने में मदद करती है) और आवश्यक हर चीज उपलब्ध  कराती है। हर परिवार स्त्री-पुरुष के आपसी सामंजस्य से ही चलता है। गुड़ी बांधे भले पुरुष, थामते तो स्त्री के ही हाथ हैं। गुड़ी के आगे रंगोली निकाल प्रथम पूजन का अधिकार स्त्री का ही है तो बने  हुये पकवानों का भोग लगा नैवेद्य अर्पण करने का अधिकार पुरुष का…।
 

नीम के पत्ते का प्रसाद:

 
गुड़ी को सजाने के लिए नीम की के पत्ते भी लगाये जाते और गुड़ी उतारने के बाद उसे प्रसाद के रूप में सबमे बांटा जाता है। बचपन मे हम इस कड़वे प्रसाद से बचने की असफल कोशिश करते थे, परंतु घर के बड़े यह प्रसाद खिलाकर ही मानते थे…क्योंकि यह स्वास्‍थ्यवर्धक हैं । मेरे अनुभव में दुख और श्रम का भी अपना महत्व रहा है । त्योहार के दरम्यान हम कड़वाहट और अप्रिय के साथ भी जीना सीख लेते हैं।
 

मिठास की गांठें : 

 
गुड़ी की सजावट में बच्चों का ध्यान खींचने वाला हिस्सा- गुड़ी को शक्कर की गांठों से सजाया जाता है। इन शक्कर के गांठों के साथ ही तो नीम के पत्तो को मिला शाम का प्रसाद बन जाता है । किसी मुश्किल चीज को संभालना हो तो थोड़ी मिठास के साथ आसान है ।
पूजा, प्रार्थना के साथ शुरू होता यह पर्व , संबंधों और मित्रों के बीच घर के बने मीठे व्यंजनों का आदान-प्रदान तथा  दावत एवं मेहमान नवाजी के साथ ही पूरा होता है।
 

पूरन पोली एवं श्रीखंड की मधुरता : 

 
इस पर्व पर पूरण पोली या श्रीखंड बनाने का रिवाज है।  पूरण पोली की मिठास, और श्रीखंड हाजिर है अपनी मधुरता, मिठास, स्निग्धता के साथ ठंडक देने के लिये…!
घर के भोजन में जो स्वाद और पवित्रता है उसे कितने भी महंगे होटल में नहीं पाया जा सकता। हर भारतीय त्योहार परिवार के स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक भोजन की भी परंपरा है। 
महामारी के इस समय में संबंधों और स्वस्थ जीवनशैली के महत्व को कठोरता से ध्यान दिलाने वाले  इस नववर्ष की –
शुभकामनाओं के साथ…!
 
आपकी श्रद्धा 
Founder – Director
Farmers Pride